वे बहुत बडे आचार्य हैं
हिंदी विभाग के भावी प्राचार्य हैं
वे परम पवित्र हैं
उन्हें आज के कवियों की कविताओं से घिन आती है
उनका आरोप है इन्हें भाषा नहीं आती छन्द नहीं आता
वे आज के कवियों पर तरस खाते हैं
अखबारों -पत्रिकाओं में आंसू बहाते हैं
आग उगलते हैं ताना देते हैं
वे तोप हैं
वे गोला हैं
वे आग हैं , बारूद हैं
वे कुछ भी कर सकते हैं
आपको आसमान में चढा सकते हैं
जन्नत में पहुँचा सकते हैं
जुगाड़ लगवा सकते हैं
जो चाहे सो करवा सकते हैं
वे कविताएँ कम पढते हैं
कविताओं पर कागज बहुत रंगते हैं
नए कवियों से रंज रहते हैं
वे कहते हैं
ये पानी पर क्यों लिखतें हैं
पेशाब पर क्यों नहीं लिखते हैं
अगर ये ऐसा लिखते हैं
और वैसा नहीं लिखते हैं
तो आकर उनसे क्यों नही मिलते हैं
वे नए कवियों के संस्कार से बहुत रंज रहते हैं ।
(आलोचक पर कविता लिखी लेकिन वह बात नहीं लिखी । माफ करेंगे । )
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