Saturday, October 13, 2007

समाजवाद

गोरख पाण्डेय



समाजवाद बबुआ , धीरे-धीरे आयी

समाजवाद उनके धीरे -धीरे आयी



हाथी से आयी

घोडा से आयी

अंग्रेजी बाजा बजायी , समाजवाद ...

नोटवा से आयी

वोटवा से आयी

बिड़ला के घर में समायी , समाजवाद ...

गांधी से आयी

आंधी से आयी

टुटही मडैयो उड़ाई ,समाजवाद ...

कांग्रेस से आयी

जनता से आयी

झंडा के बदली हो जाई , समाजवाद ...

डालर से आयी

रूबल से आयी

देसवा के बान्हे धराई , समाजवाद ...

वादा से आयी

लबादा से आयी

जनता के कुर्सी बनाई , समाजवाद ...

लाठी से आयी

गोली से आयी

बाकिर अहिंसा कहाई , समाजवाद...

महंगी ले आयी

गरीबी ले आयी

केतनो मजूरा कमाई , समाजवाद ...

छोटका के छोटहन

बड़का के बड़हन
बखरा बराबर लगाई , समाजवाद ...

परसों ले आयी

बरसों ले आयी

हरदम आकासे तकाई , समाजवाद ...

धीरे-धीरे आयी

चुपे-चुपे आयी

अँखिया पर परदा लगाई , समाजवाद ...

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी ।



अपने क्रान्तिधर्मी गीतों के लिए हमसबके प्रिय गोरख का यह भोजपुरी में लिखा व्यंग्य-गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है । उनके भोजपुरी गीतों का एक संकलन मेरे लेखक मित्र जितेन्द्र वर्मा ने अपनी छोटी सी भूमिका के साथ प्रकाशित किया है । उनका पता -अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन

श्री भवन ,महेन्द्रू , पटना-८००००६। मोबाइल -०९४३०६७७५२३ । उन्हें धन्यवाद , बधाई और मुझे ऐसा प्रिय साहित्य भेजने के लिए आभार । कृतज्ञ हूँ जितेंद्र जी मैं । हिंदी में जारी चुतियापा से दूर रहकर और कुछ अच्छा करें और मुझे भी सहभागी मानें और बनायें ।

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