गोरख पाण्डेय
समाजवाद बबुआ , धीरे-धीरे आयी
समाजवाद उनके धीरे -धीरे आयी
हाथी से आयी
घोडा से आयी
अंग्रेजी बाजा बजायी , समाजवाद ...
नोटवा से आयी
वोटवा से आयी
बिड़ला के घर में समायी , समाजवाद ...
गांधी से आयी
आंधी से आयी
टुटही मडैयो उड़ाई ,समाजवाद ...
कांग्रेस से आयी
जनता से आयी
झंडा के बदली हो जाई , समाजवाद ...
डालर से आयी
रूबल से आयी
देसवा के बान्हे धराई , समाजवाद ...
वादा से आयी
लबादा से आयी
जनता के कुर्सी बनाई , समाजवाद ...
लाठी से आयी
गोली से आयी
बाकिर अहिंसा कहाई , समाजवाद...
महंगी ले आयी
गरीबी ले आयी
केतनो मजूरा कमाई , समाजवाद ...
छोटका के छोटहन
बड़का के बड़हन
बखरा बराबर लगाई , समाजवाद ...
परसों ले आयी
बरसों ले आयी
हरदम आकासे तकाई , समाजवाद ...
धीरे-धीरे आयी
चुपे-चुपे आयी
अँखिया पर परदा लगाई , समाजवाद ...
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी ।
अपने क्रान्तिधर्मी गीतों के लिए हमसबके प्रिय गोरख का यह भोजपुरी में लिखा व्यंग्य-गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है । उनके भोजपुरी गीतों का एक संकलन मेरे लेखक मित्र जितेन्द्र वर्मा ने अपनी छोटी सी भूमिका के साथ प्रकाशित किया है । उनका पता -अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन
श्री भवन ,महेन्द्रू , पटना-८००००६। मोबाइल -०९४३०६७७५२३ । उन्हें धन्यवाद , बधाई और मुझे ऐसा प्रिय साहित्य भेजने के लिए आभार । कृतज्ञ हूँ जितेंद्र जी मैं । हिंदी में जारी चुतियापा से दूर रहकर और कुछ अच्छा करें और मुझे भी सहभागी मानें और बनायें ।
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