Thursday, October 18, 2007

अपने-अपने त्रिलोचन

फणीश्वर नाथ रेणु






त्रिलोचन से जब पहली बार दशाश्वमेध घाट की सीढियों पर उतरने वाली सड़क पर मेरा परिचय करवाया गया तो, उन्होने उलाहना भरे स्वर मे व्यंग्मयी मुस्कुराहट के साथ कहा था-खूब मच्छड कटवाया है बसवडिया मे आपने ....




मैला आँचल की राजपूत टोली के शिवश्क्कर सिंघ के बेपानी होने का प्रसंग मे उनकी यह उक्ति सुनकर उस समय मुझे लगा था , त्रिलोचन जी को किसी कारणवश मैला-आँचल पसंद नहीं । होटल लौटकर , बहुत देर तक सोचता रहा था-सारे उपन्यास में बस वही स्थल बसवडिया ही क्यों याद रहा त्रिलोचन को ? बांसों का झुरमुट , अंधकार में जुगनुओं की चमक , सपों की बाबियों से आती हुई रिस-भरी फुफकार और सहस्त्रों मशको का एक-साथ ही शत-शत दंशन ...?




दूसरे दिन किसी मित्र से जब सुना कि त्रिलोचन जी मैला आँचल के प्रशंसकों में से हैं तो फिर उस रात को बहुत देर तक बस यहीं सोचता रहा कि साडी किताब मे त्रिलोचन जी को वही स्थल और प्रसंग क्यों याद रहा?




और पहली मुलाकात -बात के समय से आज तक जब भी त्रिलोचन को देखता हूँ , क्षण भर के लिए भरम-जल मे पड़ जाता हूँ । अपने गाँव के समृद्ध कबीर-पंथी मठ पर,बचपन मे ही -कबीर चौरा काशीजी से आये हुए एक सद्यः यौवन कबिराहा बाबाजी को देखा था-लंगोट बांधकर आसन करते ढाई सेर धरोष्ण दूध (भैंस का ) पीते । मठ के अधिकारी भंडारी साधु-वैरागी जिसके बारे मे बाते करते -विदियार्थी जी मोती जेसन अक्षर मे बीजक लिखलन हे ई विदियारथी तो बीजक के एक-एक गो साखी और शबद के ऐसन-ऐसन बिल्च्छन आ अम्नियाँ अरथ अपन तहियायेल भाखा मे समझावे हैं कि सुन्निहार सब के अथि फट जाये ।


याद है , धूनी के पास बैठकर विद्यार्थी जी कई गृहस्थ -सेवकों को समझा रहे थे । बातचीत की कई पंक्तियाँ , अपनी शाब्दिक रहस्यमयता तथा विलक्षणता के साथ आज तक याद हैं कि एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार -और - ओ ररा रमा की भांति रूरी , सब संत उघारिन चुंदरी ...


सो त्रिलोचन को देखते ही मुझे पहले उसी बाबाजी -विद्यार्थी जी की याद आ जाया करती है और ये ही पंक्तियाँ अंतर्मन मे धव्नित होती हैं-एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार ...


कभी त्रिलोचन जी को अपने साथ अपने गाँव ले चलूँ तो मेरा विश्वाश है कि परिचय करवाने की आवश्यकता नहीं होगी । बडे-बडे गृहस्थ गृहों की भक्तिमय आत्माएं उनके पास आकर , अपने चेहरे से चुनरी हटाकर कबिराहा अंदाज में दोनो हाथ जोड़कर विगलित -सी होती हुई पुकार उठेंगी -सा -हे -ब। बन्दगी । । ...त्रिलोचन जी निश्चय ही अचरज मे पड़ जायेंगे । मजा आ जाएगा ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन हमारे गाँव के हर सतरंगी जीवन को देखते ही नाम ले-लेकर पुकार उठें और हमें ही घोर अचरज में डाल दें । अथवा शाम के झुर्पुते मे किसी पगडडी को पार करते समय किसी बसवडिया के घुप अंधकार मे डूबती हुई झाड़ी की और दिखलाकर पूछें -क्यों रेणू जी , यही वह जगह है न , जहाँ ...?(सोचता हूँ और अपने से ही पूछता हूँ कि आख़िर ...यार , ये तुम ही उस जगह की चर्चा छिड़ते ही सर्द क्यों हो जाते हो ? तुम्हारा चेहरा रक्तहीन क्यों हो जाता है ?त्रिलोचन ने तुम्हे पकडा है या शिव्शाक्कर सिंह को गाँव के लड़कों ने ?))
कई बार चाहा कि त्रिलोचन से पूछूँ -आप कभी पूर्णिया जिला की और किसी भी हैसियत से किसी क्बिराहा मठ पर गए हैं? किन्तु पूछकर इस भ्रम को दूर करना नही चाहता । इसे पाले रहना चाहता हूँ । इसलिए जब त्रिलोचन से मिलता हूँ , हाथ जोड़कर मन-ही -मन कहता हूँ --सा-हे-ब ....बन-द-गी .....

इस लेख का बाकी हिस्सा ब्रेक के बाद इंतजार कीजिए .....

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