Monday, February 4, 2008

खिलाडी दोस्त


खिलाडी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले बता दूं सावधान कर दूं मेरा
इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ नहीं
है जो जिन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है
जो खेल को ही जिन्दगी
समझते हैं जो कही भी खेलना शुरू
कर देते हैं जो अक्सर पारंपरिक मैदानों के बाहर

gair paarmprik khel khelte rhte hain


वे दोस्त

खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल

जब भी जहाँ

मौका मिलता है पदाने लगते हैं

पते फेंकने लगते हैं

बुझौव्वल बुझाने लगते हैं

गोटी बिछाने लगते हैं

आंखों पर कसकर बांध देते हैं रुमाल

और दुखती रग को दुखाने लगते हैं

वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं

दोस्ती में खेलना

सही तरह पैर फंसाना वे जानते हैं

जानते हैं वे कब

कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौडाएंगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त

वे हाथ मिलाते हुए अक्सर हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताकत आंकते रहते हैं
अक्सर थके हुए दौर में

भुला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त

वे आंसू नहीं मानते

तटस्थ वसूलते हैं कीमत हमारे हारने की

सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों

दुःख में अकेला नहीं छोड़ते

आ जाते हैं डंडा सम्हाले

उदासी और थकान में

शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं
दोस्त अवसर देखते रहते हैं काम आने का

और मुश्किल समय में अक्सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम

हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं खैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयां देखकर
हताश नहीं होते
वे मूंछों में लिथड़ाती मुस्कान bikherte hain
दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम
उठाकर हमें मैदान में खडा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का chhilnaa
ताली बजाते रहते हैं वे
मूंगफली खाते रहते हैं वे
और कहते हैं
धीरे-धीरे सिख जाओगे खेल

जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं ,कहाँ-कहाँ भागोगे
भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे
खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाडी दोस्त से ही
अक्सर खेलते हैं खेल
hare prakash upadhyay
hpupadhyay@gmail.com
mobile-9910222564



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