दफ्तरी कंप्यूटर पर अफसरी रौब में डिक्टेट करवाई अफसर-कवि ने
नाभिदर्शना सेक्रेटरी को पूरी गंभीरता से संचिका-हस्ताक्षरी-सत्र में कविता
जगण, मगण, तगण का रखा पूरा ख्याल
घोंट डाला था विद्यार्थी जीवन में ही अफसर-कवि ने पूरा भारतीय काव्यशास्त्र
और तभी से वे पूरे परिवार में माने गए अपनी कौशल्या की नजरों में...भये प्रगट कृपाला...
संपादकों के लिए खुली रहती है हमेशा उनके दफ्तर में विज्ञापन देनेवाली फाइल
और पधारित शाम को मद्याधारित पूरी खाली और खुली शाम
जो लघु-पत्रिकाओं के महत्वपूर्ण पृष्ठों पर काव्य-रूप में सार्थकता पाती है
ऐसी ही शामों में नफरतों, अफवाहों और गालियों से गर्म होती
राजधानी की ज्यादातर महफिलों में तय होते हैं पुरस्कार
तय होती हैं समीक्षा के लिए पृष्ठों की संख्या और आलोचना जगत में
मुनादियों की बारंबारता का प्रतिशत पूरे हिसाब-किताब के साथ
पुरस्कारोत्सुकी आत्माएं अक्सर चक्कर काटती दीखती हैं इन शामों में
दावतों और हें.हें..हें टाइप हँसी की पूरी अश्लीलता को सख्ती से दरकिनार करते हुए
इन्हें कोई जरूरत नहीं यह जानने की कि मुक्तिबोध के जीते जी
उनका एक भी कविता-संग्रह नहीं छप सका और पागल के आभूषण से नवाजे गए
दारागंज में भटकते हुए निराला साहित्य अकादमी के बेखबरी से बेपरवाह
फणीश्वरनाथ रेणु भी अपने नाम के अनुकूल महज एक धूल के कण समझे गए
आज तुक्कड़ों के वार्डरोब में शाल रखने की जगह नहीं बची
और अंटा पड़ा है उनका नफीस ड्राइंग रूम प्रशस्ति-पत्रों से
जहां किसी रियासत के महाराज की तरह उनकी छाती पर लटकते मोबाइल पर
अनवरत सूचना आती रहती है रसरंजक शामों को रंगीन करने
राजधानी के सबसे महंगे इलाके बेहद महंगे और नफासतपसंद क्लब में
इस दौर में निराला को याद मत करो
मत करो चर्चा उस मुंहफट नागार्जुन की जो पैदा ही बाबा बनकर हुआ था
और सब के रसोईघर तक सीधे घुसपैठ कर लेता था
इस प्रजाति के कवियों की कोई जगह नहीं दीखती सांझ-गोष्ठी के रसरंगी आकाओं के बीच
हम जो देखते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम जो बोलते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम जो करते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम वही करते हैं जो हमारा समीकरण कहता है
संस्कृति पुरुष ने इन दिनों बहुतेरे अफसरों को रुपांतरित किया है काव्य-पुरुषों में
और जाहिर है आभार के भार से दबे काव्य-पुरुष जो कर सकते हैं एवज में
वह करते रहते हैं पूरी निष्ठा से संचिका-निबटाऊ-सत्र में
उनके लिए विदेशी दौरों, कमिटियों और रसरंजक शामों के लिए हलकान.....
-पंकज पराशर
hamaradesht
Saturday, March 8, 2008
Monday, February 11, 2008
क्या जानते हो
नदी में तैरते हुए सोचता हूँ
पानी नदी के बारे में क्या जानता है
नदी से पूछता हूँ
तुम पानी की हो या मेरी
नदी कोई जवाब नहीं देती
वह हवा की और इशारा करती है
धूप से आँख-मिचौली खेलती हवा के बारे
हम क्या जानते हैं ?
कोई किसी के बारे में क्या जानता है
एक स्त्री जो रोज चूल्हा जलाती है
आग के बारे में क्या जानती है
आग ही आग के बारे में क्या जानती है
मैं उदास हूँ तो मित्र
तुम भी उदास हो जाते हो
मेरी उदासी में
किसकी हंसी शामिल है
तुम क्या जानते हो ?
पानी नदी के बारे में क्या जानता है
नदी से पूछता हूँ
तुम पानी की हो या मेरी
नदी कोई जवाब नहीं देती
वह हवा की और इशारा करती है
धूप से आँख-मिचौली खेलती हवा के बारे
हम क्या जानते हैं ?
कोई किसी के बारे में क्या जानता है
एक स्त्री जो रोज चूल्हा जलाती है
आग के बारे में क्या जानती है
आग ही आग के बारे में क्या जानती है
मैं उदास हूँ तो मित्र
तुम भी उदास हो जाते हो
मेरी उदासी में
किसकी हंसी शामिल है
तुम क्या जानते हो ?
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Monday, February 4, 2008
खिलाडी दोस्त

खिलाडी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले बता दूं सावधान कर दूं मेरा
इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ नहीं
है जो जिन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है
जो खेल को ही जिन्दगी
समझते हैं जो कही भी खेलना शुरू
कर देते हैं जो अक्सर पारंपरिक मैदानों के बाहर
जब भी जहाँ
मौका मिलता है पदाने लगते हैं
पते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आंखों पर कसकर बांध देते हैं रुमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं
वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फंसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौडाएंगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक्सर हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताकत आंकते रहते हैं
अक्सर थके हुए दौर में
भुला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आंसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं कीमत हमारे हारने की
सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुःख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सम्हाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं
दोस्त अवसर देखते रहते हैं काम आने का
और मुश्किल समय में अक्सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम
हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं खैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयां देखकर
हताश नहीं होते
वे मूंछों में लिथड़ाती मुस्कान bikherte hain
दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम
उठाकर हमें मैदान में खडा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का chhilnaa
ताली बजाते रहते हैं वे
मूंगफली खाते रहते हैं वे
और कहते हैं
धीरे-धीरे सिख जाओगे खेल
जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं ,कहाँ-कहाँ भागोगे
भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे
खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाडी दोस्त से ही
अक्सर खेलते हैं खेल
hare prakash upadhyay
hpupadhyay@gmail.com
mobile-9910222564
बताने से पहले बता दूं सावधान कर दूं मेरा
इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ नहीं
है जो जिन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है
जो खेल को ही जिन्दगी
समझते हैं जो कही भी खेलना शुरू
कर देते हैं जो अक्सर पारंपरिक मैदानों के बाहर
gair paarmprik khel khelte rhte hain
वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेलजब भी जहाँ
मौका मिलता है पदाने लगते हैं
पते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आंखों पर कसकर बांध देते हैं रुमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं
वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फंसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौडाएंगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक्सर हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताकत आंकते रहते हैं
अक्सर थके हुए दौर में
भुला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आंसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं कीमत हमारे हारने की
सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुःख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सम्हाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं
दोस्त अवसर देखते रहते हैं काम आने का
और मुश्किल समय में अक्सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम
हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं खैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयां देखकर
हताश नहीं होते
वे मूंछों में लिथड़ाती मुस्कान bikherte hain
दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम
उठाकर हमें मैदान में खडा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का chhilnaa
ताली बजाते रहते हैं वे
मूंगफली खाते रहते हैं वे
और कहते हैं
धीरे-धीरे सिख जाओगे खेल
जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं ,कहाँ-कहाँ भागोगे
भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे
खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाडी दोस्त से ही
अक्सर खेलते हैं खेल
hare prakash upadhyay
hpupadhyay@gmail.com
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Saturday, January 12, 2008
Literatures of assam
Alaka Yeravadekar
Management Accountant, currently faculty with a B-School. Also freelance content and travel writer. Interests are photography, travel, nature and music.
Her email: alakaa@gmail.com
Garland weavers
They sit in a row.
Old shirts, once-white kurtas,
and nine yard sarees.
Woven baskets in front,
deft hands stringing garlands
of mogra, crysanthemums
marigold and sweet
scented nishigandh.
Snip snip go the scissors
ruthlessly chopping off
unwanted foliage.
Intertwining moments
of fun, laughter and celebrations.
And a requiem
for the dead.
You and I
Thoughts
unsaid
unspoken
unwritten
clutter
the space
between us
creating
an aberration
on a normal graph,
a knot
in the thread
to be passed
through a needle.
To my muse
I.If we met
The seas could churn
and earth might burn,
snowcaps melt,
rainbows explode.
Then words might dance
and vowels thunder,
consonants blazea trail of surrender.
Or perhaps
waves would glide
in mellow light,
and gentle rain
soften the night?
if we but met…
II.
Call me blood-thirsty leech
if you must.
I can see
what might ensue
but I need to burrow
deep, into
your warm presence,
feed off your brains
drink in your thoughts.
.Dry tinder
burns fast.
When we meet
I might catch fire,
but I must die
for only then
my poem flowers.
(with courtsy from Muse India)
Management Accountant, currently faculty with a B-School. Also freelance content and travel writer. Interests are photography, travel, nature and music.
Her email: alakaa@gmail.com
Garland weavers
They sit in a row.
Old shirts, once-white kurtas,
and nine yard sarees.
Woven baskets in front,
deft hands stringing garlands
of mogra, crysanthemums
marigold and sweet
scented nishigandh.
Snip snip go the scissors
ruthlessly chopping off
unwanted foliage.
Intertwining moments
of fun, laughter and celebrations.
And a requiem
for the dead.
You and I
Thoughts
unsaid
unspoken
unwritten
clutter
the space
between us
creating
an aberration
on a normal graph,
a knot
in the thread
to be passed
through a needle.
To my muse
I.If we met
The seas could churn
and earth might burn,
snowcaps melt,
rainbows explode.
Then words might dance
and vowels thunder,
consonants blazea trail of surrender.
Or perhaps
waves would glide
in mellow light,
and gentle rain
soften the night?
if we but met…
II.
Call me blood-thirsty leech
if you must.
I can see
what might ensue
but I need to burrow
deep, into
your warm presence,
feed off your brains
drink in your thoughts.
.Dry tinder
burns fast.
When we meet
I might catch fire,
but I must die
for only then
my poem flowers.
(with courtsy from Muse India)
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Married
by Richard Stevenson
To one Joan Hale, forty-year-old red head.Not the sharpest tool in the shed, perhaps,but loyal and better than you ever deserved.You beat and verbally abused her,but could be attentive, even adeptbetween the sheets, to hear her tell the tale.Became a born-again Christian,attended church regularly to createthe Mr. Suburban Clean Machine personayou so desperately needed to helpkeep the feds and local heatat bay, and she trusted you, boughtthe endless shovels full you spreadabout the need for car rentals in yournew construction trade. You’d turn the cornerany day, make the business a success,for hadn’t you always come up with cashwhen you really needed it? you said.Joan became the business secretary,had a good head for figures, could alwaysconvince the customers drunken hubby wouldpay the bills. Even got pregnant,moved you into a low-rent apartmentwhere the welfare moms made life pleasantand you would find it suitable foryour own purposes, could feel a cut above and find lots of kids easy to impress.Just like a kid’s piggy bank, eh Cliffy –all you have to do is smash it with a hammerto get a little pocket change and get your end wet.
(from Evergreenreview)
To one Joan Hale, forty-year-old red head.Not the sharpest tool in the shed, perhaps,but loyal and better than you ever deserved.You beat and verbally abused her,but could be attentive, even adeptbetween the sheets, to hear her tell the tale.Became a born-again Christian,attended church regularly to createthe Mr. Suburban Clean Machine personayou so desperately needed to helpkeep the feds and local heatat bay, and she trusted you, boughtthe endless shovels full you spreadabout the need for car rentals in yournew construction trade. You’d turn the cornerany day, make the business a success,for hadn’t you always come up with cashwhen you really needed it? you said.Joan became the business secretary,had a good head for figures, could alwaysconvince the customers drunken hubby wouldpay the bills. Even got pregnant,moved you into a low-rent apartmentwhere the welfare moms made life pleasantand you would find it suitable foryour own purposes, could feel a cut above and find lots of kids easy to impress.Just like a kid’s piggy bank, eh Cliffy –all you have to do is smash it with a hammerto get a little pocket change and get your end wet.
(from Evergreenreview)
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Tuesday, December 18, 2007
लॉट आया हूँ
मैं बहुत दिनों से ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ । न किसी की कोई कविता दे रहा हूँ , न अपनी । न किसी की खबर ले रहा हूँ , न अपनी दे रहा हूँ । यह बात मुझे आज अचानक तब पता चली , जब अचानक आज मैंने अपना ब्लॉग देखा । मेरा ब्लॉग कोई नहीं देखता , नहीं तो कोई न कोई मुझे यह बताता ही कि मैं अपना ब्लॉग नही लिख रहा हूँ। खैर मैं खुद आपसे बता रहा हूँ कि मैं ब्लॉग नही लिख रहा हूँ । देर हो गई क्षमा करेंगे , दरअसल मुझे खुद देर से यह बात पता चली कि मैं अपना ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ , दूसरों का क्या गिला करूं , जब अपना ब्लॉग मैं खुद ही नही देखता । और जब मैं ही अपना ब्लॉग नही देखता तो भला आप कैसे देखेंगे ? दरअसल मैं एक समुद्री यात्रा पर चला गया था । वहाँ मैं अपना ब्लॉग भला कैसे देखता या आपका ही कैसे देखता । समुद्री यात्रा में मेरा कुछ नहीं उखडा , मोबाइल और डूब गया । नया लिया है , नम्बर है-०९९१०२२२५६४आप् की दुआ से यह बना रहेगा , यह आशा है , क्या ?
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Thursday, October 18, 2007
अपने-अपने त्रिलोचन
फणीश्वर नाथ रेणु
त्रिलोचन से जब पहली बार दशाश्वमेध घाट की सीढियों पर उतरने वाली सड़क पर मेरा परिचय करवाया गया तो, उन्होने उलाहना भरे स्वर मे व्यंग्मयी मुस्कुराहट के साथ कहा था-खूब मच्छड कटवाया है बसवडिया मे आपने ....
मैला आँचल की राजपूत टोली के शिवश्क्कर सिंघ के बेपानी होने का प्रसंग मे उनकी यह उक्ति सुनकर उस समय मुझे लगा था , त्रिलोचन जी को किसी कारणवश मैला-आँचल पसंद नहीं । होटल लौटकर , बहुत देर तक सोचता रहा था-सारे उपन्यास में बस वही स्थल बसवडिया ही क्यों याद रहा त्रिलोचन को ? बांसों का झुरमुट , अंधकार में जुगनुओं की चमक , सपों की बाबियों से आती हुई रिस-भरी फुफकार और सहस्त्रों मशको का एक-साथ ही शत-शत दंशन ...?
दूसरे दिन किसी मित्र से जब सुना कि त्रिलोचन जी मैला आँचल के प्रशंसकों में से हैं तो फिर उस रात को बहुत देर तक बस यहीं सोचता रहा कि साडी किताब मे त्रिलोचन जी को वही स्थल और प्रसंग क्यों याद रहा?
और पहली मुलाकात -बात के समय से आज तक जब भी त्रिलोचन को देखता हूँ , क्षण भर के लिए भरम-जल मे पड़ जाता हूँ । अपने गाँव के समृद्ध कबीर-पंथी मठ पर,बचपन मे ही -कबीर चौरा काशीजी से आये हुए एक सद्यः यौवन कबिराहा बाबाजी को देखा था-लंगोट बांधकर आसन करते ढाई सेर धरोष्ण दूध (भैंस का ) पीते । मठ के अधिकारी भंडारी साधु-वैरागी जिसके बारे मे बाते करते -विदियार्थी जी मोती जेसन अक्षर मे बीजक लिखलन हे ई विदियारथी तो बीजक के एक-एक गो साखी और शबद के ऐसन-ऐसन बिल्च्छन आ अम्नियाँ अरथ अपन तहियायेल भाखा मे समझावे हैं कि सुन्निहार सब के अथि फट जाये ।
याद है , धूनी के पास बैठकर विद्यार्थी जी कई गृहस्थ -सेवकों को समझा रहे थे । बातचीत की कई पंक्तियाँ , अपनी शाब्दिक रहस्यमयता तथा विलक्षणता के साथ आज तक याद हैं कि एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार -और - ओ ररा रमा की भांति रूरी , सब संत उघारिन चुंदरी ...
सो त्रिलोचन को देखते ही मुझे पहले उसी बाबाजी -विद्यार्थी जी की याद आ जाया करती है और ये ही पंक्तियाँ अंतर्मन मे धव्नित होती हैं-एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार ...
कभी त्रिलोचन जी को अपने साथ अपने गाँव ले चलूँ तो मेरा विश्वाश है कि परिचय करवाने की आवश्यकता नहीं होगी । बडे-बडे गृहस्थ गृहों की भक्तिमय आत्माएं उनके पास आकर , अपने चेहरे से चुनरी हटाकर कबिराहा अंदाज में दोनो हाथ जोड़कर विगलित -सी होती हुई पुकार उठेंगी -सा -हे -ब। बन्दगी । । ...त्रिलोचन जी निश्चय ही अचरज मे पड़ जायेंगे । मजा आ जाएगा ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन हमारे गाँव के हर सतरंगी जीवन को देखते ही नाम ले-लेकर पुकार उठें और हमें ही घोर अचरज में डाल दें । अथवा शाम के झुर्पुते मे किसी पगडडी को पार करते समय किसी बसवडिया के घुप अंधकार मे डूबती हुई झाड़ी की और दिखलाकर पूछें -क्यों रेणू जी , यही वह जगह है न , जहाँ ...?(सोचता हूँ और अपने से ही पूछता हूँ कि आख़िर ...यार , ये तुम ही उस जगह की चर्चा छिड़ते ही सर्द क्यों हो जाते हो ? तुम्हारा चेहरा रक्तहीन क्यों हो जाता है ?त्रिलोचन ने तुम्हे पकडा है या शिव्शाक्कर सिंह को गाँव के लड़कों ने ?))
कई बार चाहा कि त्रिलोचन से पूछूँ -आप कभी पूर्णिया जिला की और किसी भी हैसियत से किसी क्बिराहा मठ पर गए हैं? किन्तु पूछकर इस भ्रम को दूर करना नही चाहता । इसे पाले रहना चाहता हूँ । इसलिए जब त्रिलोचन से मिलता हूँ , हाथ जोड़कर मन-ही -मन कहता हूँ --सा-हे-ब ....बन-द-गी .....
इस लेख का बाकी हिस्सा ब्रेक के बाद इंतजार कीजिए .....
त्रिलोचन से जब पहली बार दशाश्वमेध घाट की सीढियों पर उतरने वाली सड़क पर मेरा परिचय करवाया गया तो, उन्होने उलाहना भरे स्वर मे व्यंग्मयी मुस्कुराहट के साथ कहा था-खूब मच्छड कटवाया है बसवडिया मे आपने ....
मैला आँचल की राजपूत टोली के शिवश्क्कर सिंघ के बेपानी होने का प्रसंग मे उनकी यह उक्ति सुनकर उस समय मुझे लगा था , त्रिलोचन जी को किसी कारणवश मैला-आँचल पसंद नहीं । होटल लौटकर , बहुत देर तक सोचता रहा था-सारे उपन्यास में बस वही स्थल बसवडिया ही क्यों याद रहा त्रिलोचन को ? बांसों का झुरमुट , अंधकार में जुगनुओं की चमक , सपों की बाबियों से आती हुई रिस-भरी फुफकार और सहस्त्रों मशको का एक-साथ ही शत-शत दंशन ...?
दूसरे दिन किसी मित्र से जब सुना कि त्रिलोचन जी मैला आँचल के प्रशंसकों में से हैं तो फिर उस रात को बहुत देर तक बस यहीं सोचता रहा कि साडी किताब मे त्रिलोचन जी को वही स्थल और प्रसंग क्यों याद रहा?
और पहली मुलाकात -बात के समय से आज तक जब भी त्रिलोचन को देखता हूँ , क्षण भर के लिए भरम-जल मे पड़ जाता हूँ । अपने गाँव के समृद्ध कबीर-पंथी मठ पर,बचपन मे ही -कबीर चौरा काशीजी से आये हुए एक सद्यः यौवन कबिराहा बाबाजी को देखा था-लंगोट बांधकर आसन करते ढाई सेर धरोष्ण दूध (भैंस का ) पीते । मठ के अधिकारी भंडारी साधु-वैरागी जिसके बारे मे बाते करते -विदियार्थी जी मोती जेसन अक्षर मे बीजक लिखलन हे ई विदियारथी तो बीजक के एक-एक गो साखी और शबद के ऐसन-ऐसन बिल्च्छन आ अम्नियाँ अरथ अपन तहियायेल भाखा मे समझावे हैं कि सुन्निहार सब के अथि फट जाये ।
याद है , धूनी के पास बैठकर विद्यार्थी जी कई गृहस्थ -सेवकों को समझा रहे थे । बातचीत की कई पंक्तियाँ , अपनी शाब्दिक रहस्यमयता तथा विलक्षणता के साथ आज तक याद हैं कि एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार -और - ओ ररा रमा की भांति रूरी , सब संत उघारिन चुंदरी ...
सो त्रिलोचन को देखते ही मुझे पहले उसी बाबाजी -विद्यार्थी जी की याद आ जाया करती है और ये ही पंक्तियाँ अंतर्मन मे धव्नित होती हैं-एक अंड ओंकार ते सब जग भया पसार ...
कभी त्रिलोचन जी को अपने साथ अपने गाँव ले चलूँ तो मेरा विश्वाश है कि परिचय करवाने की आवश्यकता नहीं होगी । बडे-बडे गृहस्थ गृहों की भक्तिमय आत्माएं उनके पास आकर , अपने चेहरे से चुनरी हटाकर कबिराहा अंदाज में दोनो हाथ जोड़कर विगलित -सी होती हुई पुकार उठेंगी -सा -हे -ब। बन्दगी । । ...त्रिलोचन जी निश्चय ही अचरज मे पड़ जायेंगे । मजा आ जाएगा ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन हमारे गाँव के हर सतरंगी जीवन को देखते ही नाम ले-लेकर पुकार उठें और हमें ही घोर अचरज में डाल दें । अथवा शाम के झुर्पुते मे किसी पगडडी को पार करते समय किसी बसवडिया के घुप अंधकार मे डूबती हुई झाड़ी की और दिखलाकर पूछें -क्यों रेणू जी , यही वह जगह है न , जहाँ ...?(सोचता हूँ और अपने से ही पूछता हूँ कि आख़िर ...यार , ये तुम ही उस जगह की चर्चा छिड़ते ही सर्द क्यों हो जाते हो ? तुम्हारा चेहरा रक्तहीन क्यों हो जाता है ?त्रिलोचन ने तुम्हे पकडा है या शिव्शाक्कर सिंह को गाँव के लड़कों ने ?))
कई बार चाहा कि त्रिलोचन से पूछूँ -आप कभी पूर्णिया जिला की और किसी भी हैसियत से किसी क्बिराहा मठ पर गए हैं? किन्तु पूछकर इस भ्रम को दूर करना नही चाहता । इसे पाले रहना चाहता हूँ । इसलिए जब त्रिलोचन से मिलता हूँ , हाथ जोड़कर मन-ही -मन कहता हूँ --सा-हे-ब ....बन-द-गी .....
इस लेख का बाकी हिस्सा ब्रेक के बाद इंतजार कीजिए .....
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