Sunday, April 13, 2008

मदर इंडिया

geet chaturvedi ka apni kvita pr unka aatm-kathy-
इस कविता में जो घटना आती है, वह मेरे शहर मुंबई के पास स्थित उपनगर उल्हासनगर की है. एक दिन ये दोनों औरतें हमारे दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थीं. बात 1995 की रही होगी. 1996 से 2001 तक मैंने लगातार कविताएं लिखीं. फिर ब्रेक लग गया. लंबा. 2001 में ही भास्कर ज्वाइन किया और तब से कई शहरों में डेरे डाले. 2005 में भोपाल पहुंचा, तो वहां कुमार अंबुज ने बहुत प्रेरित किया लिखने को. मदर इंडिया उस पारी की पहली कविता थी. वागर्थ ने अक्टूबर 2006 अंक में छापा इसे. और मई 2007 में इस पर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार की घोषणा हुई. कविता कई मित्रों ने पहले भी पढ़ी होगी

मदर इंडिया
(उन दो औरतों के लिए ‍ जिन्‍‍होंने कुछ दिनों तक शहर को डुबो दिया था)

दरवाज़ा खोलते ही झुलस जाएं आप शर्म की गर्मास से
खड़े-खड़े ही गड़ जाएं महीतल, उससे भी नीचे रसातल तक
फोड़ लें अपनी आंखें निकाल फेंके उस नालायक़ दृष्टि को
जो बेहयाई के नक्‍की अंधकार में उलझ-उलझ जाती है
या चुपचाप भीतर से ले आई जाए
कबाट के किसी कोने में फंसी इसी दिन का इंतज़ार करती
किसी पुरानी साबुत साड़ी को जिसे भाभी बहन मां या पत्नी ने
पहनने से नकार दिया हो
और उन्हें दी जाएं जो खड़ी हैं दरवाज़े पर
मांस का वीभत्स लोथड़ा सालिम बिना किसी वस्त्र के
अपनी निर्लज्जता में सकुचाईं
जिन्हें भाभी मां बहन या पत्नी मानने से नकार दिया गया हो

कौन हैं ये दो औरतें जो बग़ल में कोई पोटली दबा बहुधा निर्वस्त्र
भटकती हैं शहर की सड़क पर बाहोश
मुरदार मन से खींचती हैं हमारे समय का चीर
और पूरी जमात को शर्म की आंजुर में डुबो देती हैं
ये चलती हैं सड़क पर तो वे लड़के क्यों नहीं बजाते सीटी
जिनके लिए अभिनेत्रियों को यौवन गदराया है
महिलाएं क्यों ज़मीन फोड़ने लगती हैं
लगातार गालियां देते दुकानदार काउंटर के नीचे झुक कुछ ढूंढ़ने लगते हैं
और वह कौन होता है जो कलेजा ग़र्क़ कर देने वाले इस दलदल पर चल
फिर उन्हें ओढ़ा आता है कोई चादर परदा या दुपट्टे का टुकड़ा

ये पूरी तरह खुली हैं खुलेपन का स्‍वागत करते वक़्त में
ये उम्र में इतनी कम भी नहीं, इतनी ज़्यादा भी नहीं
ये कौन-सी महिलाएं हैं जिनके लिए गहना नहीं हया
ये हम कैसे दोगले हैं जो नहीं जुटा पाए इनके लिए तीन गज़ कपड़ा

ये पहनने को मांगती हैं पहना दो तो उतार फेंकती हैं
कैसा मूडी कि़स्म का है इनका मेटाफिजिक्‍स
इन्हें कोई वास्ता नहीं कपड़ों से
फिर क्यों अचानक किसी के दरवाज़े को कर देती हैं पानी-पानी

ये कहां खोल आती हैं अपनी अंगिया-चनिया
इन्हें कम पड़ता है जो मिलता है
जो मिलता है कम क्यों होता है
लाज का व्यवसाय है मन मैल का मंदिर
इन्हें सड़क पर चलने से रोक दिया जाए
नेहरू चौक पर खड़ा कर दाग़ दिया जाए
पुलिस में दे दें या चकले में पर शहर की सड़क को साफ़ किया जाए

ये स्त्रियां हैं हमारे अंदर की जिनके लिए जगह नहीं बची अंदर
ये इम्तिहान हैं हममें बची हुई शर्म का
ये मदर इंडिया हैं सही नाप लेने वाले दर्जी़ की तलाश में
कौन हैं ये
पता किया जाए.

Geet Chaturvedi ka aatm-prichy :
I am the escaped one./ After I was born / They locked me up inside me / But I left./ My soul seeks me / Through hills and valley,/ I hope my soul / Never finds me./ ****** I know, I alone / How much it hurts, this heart / With no faith nor law / Nor melody nor thought. / ****** I have no ambitions or wants / To be a poet is not ambition of mine. / It is the way of staying alone. ****** - Fernando Pessoa

उम्र: 30
लिंग: माले
खगोलीय राशि: धनु
राशि वर्ष: साँप
उद्योग: प्रकाशन
व्यवसाय: Journalist
स्थान: Jalandhar : Punjab : भारत
रुचि:
poetry fiction music cinema.
पसंदीदा मूवी्स:
films by fellini chaplin makhmalbaf bimal roy and gurudutt.the titles are la strada eight n half dastforoush modern times the great dictator do bigha zameen pyaasa and kaaghaz ke phool.
पसंदीदा संगीत:
george michael- father figure careless whispers. bryan adams- please forgive me all for love everhthing i do... i do it for you. guns n' roses- paradise city the november rain sweet child o' mine. nirvana- nevermind. endless list includes ustad amir khan kumar gandharva habib wali mohammad bob dylan mettalica deep purple enrique jason donovan sting elton john red hot chilli peppers saigan kick ali haider norah jones mubarak begum shamshad begum lata mangeshkar mukesh and rafi.
पसंदीदा पुस्तकें:
works by gabo marquez neruda nirmal verma amarkant carlos fuentes yannis ritsos wislawa szymborska Czeslaw Milosz mandelstam pasternak odysseus elytis italo calvino faulkner kafka adam zagajewski arun kolatkar bhau padhye dilip chitre vishnu khare mangalesh dabral uday prakash and zeeshan sahil.
ब्लॉग्: वैतागवाड़ी

Thursday, April 10, 2008

व्योमेश शुक्ल कविताएं

1.प्रकृति

वह कई बार पेड़ों और दूसरी वनस्पतियों के पास जाता है लेकिन वह उनके नाम कम ही जानता है अपरिचय है यह जानने के बावजूद के ये एक बड़ी सचाई है दुनिया में ज्यादा जगह घेरती हैं जैसे नदियां झीलें समुद्र या दूसरे पानी या दूसरे हरे



जब वह इन सब के बीच होता है तो अपने से अकेला होता है जैसे यदि इन्हें नहीं जानता या कम जानता है तो खुद को भी नहीं जानता या कम जानता हो जाता है



उसके लिए प्रकृति चित्र है एक बड़ा चित्र वह शहर में पैदा हुआ उसने चीजों और लोगों को करीब देखा है और इन करीबों के बीच को ही वह दूरी की तरह समझ सका वह अपनी निगाह को एक छोटे से इर्दगिर्द में ही हमेशा रखता आया इतने बड़े दृश्य पर वह दृष्टि को कहां रखे



उसे एहसास होता है कि आंखों को इतने विराट में आराम मिलता होगा इस तरह देह को भी। प्रकृति के बीच में वह चुप हो जाता है अजनबियों से क्या बोले ?


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2. मैं जो लिखना चाहता था

आंख से अदृश्य का रिश्ता है

मुझे लगा है सारे दृश्य

अदृश्य पर परदा डालते हुए होते हैं

जो कुछ नहीं दिखा सब दृश्य में है

और नहीं दिख रहा है



विजय मोटरसाइकिल मिस्त्री की दुकान शनिवार को खुली हुई है

और उस खुले में दुकान की रविवार बन्दी

नहीं दिखाई दी लेकिन सोमवार को खुला दिख रहा है



इसका उलट लेकिन एक छुट्टी के दिन हुआ

दुकान बन्द थी

बन्द के दृश्य में दुकान अदृश्य रूप से खुली हुई थी

और लोग पता नहीं क्यों

उस दिन मजे लेकर मोटरसाइकिल बनवा रहे थे

मेरे पास सिर्फ एक खचाड़ा स्कूटर है कोई मोटरसाइकिल नहीं है

लेकिन मैं भी सिगरेट पीता हुआ एक बजाज पल्सर बनवा रहा था



अदृश्य से घबड़ा कर मैं दृश्य मैं चला आया

और दोस्त से पूछने लगा इस दुकान के बारे में

तो वह बोला कि आज यह दुकान

ज्यादा याद आ रही है क्या पता अपनी याद में खुली दुकान में

वह भी मेरी सिगरेट आधी पी रहा हो



मैंने घर आकर मन में कहा पांडिचेरी मैं वहां कभी नहीं गया हूं

वहां का सारा स्थापत्य मैंने खुद को बताया कि

पांडिचेरी शब्द की ध्वनि के पीछे है

लेकिन है जरूर



फिर मैंने एक वाक्य लिखना चाहा

लिखने पे चाह अदृश्य है शब्द दृश्य हैं

शब्द की वस्तुएं दिखाई दे रही हैं और

जो मैं कहना चाहता था उसका कहीं पता नहीं है

वह शायद वाक्य के परदे में है

वह नहीं वह है

मैं जो नहीं लिखना चाहता था वह कतई नहीं है


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3. 6 दिसम्बर, 2006

पहली और अन्तिम बार

आज 6 दिसम्बर 2006 है

दूसरी चीजें बार बार हैं

आज गर्व करने लायक धूप और गर्म हवा है

हमेशा की तरह

बच्चे प्रार्थनाएं और राष्ट्रगान हल्का बेसुरा गा रहे हैं

इसके बाद स्कूल बन्द हो गये

एक प्रत्याशी दिशाओं को घनघोर गुंजाता हुआ कुछ देर पहले नामांकन करने कचहरी

गया है

हमेशा की तरह

एक आदमी फोन पर हंसा बोला

गुटका 1 रुपये का है आज भी

खरीदो खाओ

ठोंक पीट हवा इंजन बोलने रोने चिोंने की आवाजें हैं

हमेशा की तरह

पंखे और वाटर पम्प बनाने वाली एक छोटी कम्पनी

आज पहली और अन्तिम बार जमींदोज हुई है

हमेशा की तरह


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4.चौदह भाई बहन

झेंप से पहले परिचय की याद उसी दिन की

कुछ लोग मुझसे पूछे तुम कितने भई बहन हो

मैंने कभी गिना नहीं था गिनने लगा

अन्नू दीदी मीनू दीदी भानू भैया नीतू दीदी

आशू भैया मानू भैया चीनू दीदी

बचानू गोल्टी सुग्गू मज्जन

पिण्टू छोटू टोनी

तब इतने ही थे

मैं छोटा बोला चौदह

वे हंसे जान गये ममेरों मौसेरों को सगा मानने की मेरी निर्दोष गलती

इस तरह मुझे बतायी गयी

मां के गर्भ और पिता के वीर्य की अनिवार्यता

और सगेपन की रूढ़ि


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5.आज

जब घर के लोग काम पर या कहीं चले जाते हैं

वे दिनचर्या के तट पर जाकर हंसने लगती हैं लेकिन

आज वे अपनी जिम्मेदारियों के छत पर खड़ी

पतंगें उड़ा रही हैं

आसमान में उन्होंने अपनी पतंगें

इतनी दूर तक बढ़ा दी हैं

कि ओझल हो गयी हैं

उन्हें वापस लाने में समय लग जाएगा

आज दूसरे कामों का हर्जा होगा

खाना देर में बनेगा कपड़ा देर से धुलेगा

नीचे फोन की घण्टी देर तक बजती रहेगी कोई नहीं उठायेगा

एक व्यक्ति दरवाजा खटाखटा कर लौट जाएगा

कोई किसी को कुछ देने या किसी से कुछ कहने आयेगा तो

यह नहीं हो पायेगा

वे छत पर हैं



आज (2)

आज कोई उससे बोल नहीं रहा है

वह भी खुद को छिपाते हुए

उसकी कोमलता निष्ठा और साहस के साक्ष्य

आज पापा की गिरफ्त में

पे्रमपत्र कहीं से घर के हत्थे लग गये

(vyomesh bnars ke hain, bnarsi nhi hain. vyomesh bhaee ka mobile hai-09335470204
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sabhar: tadbhav (editor:AKHILESH)
http://www.tadbhav.com/issue%2015/Panch%20kabitai.htm#panchkabitai

Wednesday, April 09, 2008

तुषार धवल की कविताएं

1. बहनें

आंगन में बंधे खम्भे से

लट सी उलझ जाती हैं

बहनें

और

दर्द की एक सदी

खुली छत की गर्म हवा में

कबूतर बन उड़ जाती है।



वे बाप की छप्पन साल पुरानी कमीज हैं

वे मां के बचपन की यादें हैं

जो

उठती हैं हर शाम

चूल्हे के धुएं संग

और

उड़तीं हैं पतंग बन।



वे चुनती हैं

प्याली भर चावल

कि

जिन्दगी को बनाया जा सके

अधिक से अधिक

साफ और सफेद।



वे बनती हैं

आंगन से गली

और

गली से मैदान

जहां

रात की चादर में

बुलबुले सी फूटती है भोर

और

देखते ही देखते

धरती की मां बन जाती हैं

बहनेें।


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2. नींद में बारिश

नींद में

सबके सो जाने पर

होती है बारिश

अकेले ही भीगते हैं

नदी नाव और टापू

रात की खोह में

दलदल है

इत्र का

बारिश के झिरमिर सन्नाटे में

जो एकदम से महक उठता है

शिरीष खिलता है

उनींदी बारिशों में

भीग कर आयी हवाएं

घुस आती हैं

कोरे लिहाफ के भीतर

चौंक कर ताकता है

गरदन उठाये

एक बगूला

किसी गली से झांकता है चोर



इच्छाएं

पैदा करके मुझे

मेरा ही

शिकार करती हैं।



गाथाएं अन्तर्दहन की

चुपचाप भीगती हैं

गीले गीले ही

जल रहे हैं पत्ते



भीगी हुई

रात के पिछवाड़े में

जले पत्ते

आग की कहानी कहते हैं


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3. मैं नदी तुम नदी

हर बार

जब भी डूबा

नदी नयी मिली

गर्म शिलाओं की पीठ पर

लेट कर

दिन गुजर गये।



धोते रहे

इस घाट पर

पुराने दाग

बहा ले गयी अपने साथ

नदी सब कुछ ᄉ

थमा नहीं कभी भी

कुछ भी।

उल्लास का सार

बहते रहने में था।



किनारे वही थे

द्वीप भी

भोगे हुए

वही थे

पर नदी से परिचय

हर बार अलग था।



काटे हुए पल

नयी फसल से उगते रहे

कसमसाती देह में

धीमी आंच पर

अटका हुआ

उन्हें पुकारता रहा मन

और

पीढ़ियां गुजर गयीं।

थमा नहीं कुछ भी

किसी के लिये

रिश्ते अपने किनारों से

लहरों ने

बहते हुए ही निभाये।



तुम्हारी आंखों में कई बार

नदी मिली थी

अनजान

इन पत्थरों पर

बैठ कर

गिनता रहा

लहरों को

उनमें उतरते सितारों को

बीतने की निर्धारित गति की पहचान

और उनका समवेत स्वीकार

मुझमें नदी भरता रहा

इस

नदी हुई देह को

भर रहा हूं तुममें

गर्म शिलाओं पर लेटी हुई

तुम

नयी हो रही हो।



मुझे भर कर

हर बार

तुम भी नदी हो जाती हो।


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4. छूटती चीजों के बीच

छोड़ दिया तुमने भी

जैसे कि

सब चीज छूट रही है

नहीं थी पहले भी

अब तो और भी नहीं है

इस लौटती धार में

रेत के कुछ ढूह

ढह कर भी ठहर गये हैं

पैरों के बीच फंसा

एक घोंघा

घास का एक तिनका

और

उन सबको टटोलता मन

अब भी वहीं कहीं भटक रहा है

बाजार की थिरकती रोशनी के

बीच

एक पता पूछता

छोड़ दिया तुमने

और

अब समझने लगा हूं

अन्त भी भ्रम ही है ᄉ

एक आखिरी अंगड़ाई का इन्तजार

जो फिर नहीं आती

और अब नही आयेगा वो सब

जो तुमसे उगा था

सोचता हूं

ई-मेल के खोखले शब्दों मे कौन सा रस भरूं

किस लिबास मे पेश करूं

वह सब

जो अब नहीं है --

जो था ही नहीं

और जिसके पीछे का

एक खुला आकाश और भी सुन्दर हो चला है

देर दोपहर तक

थकी उबासी के बीच

कई बार दरवाजे पर

वही परछाईं मुस्कुराती दीखी

वही आंखें बोलती रहीं

मैं देखता रहा

सुनता रहा समय के शब्द

जब

तुम नहीं हो

तुम्हें हर कहीं सुन सकता हूं

उस खुलते आकाश में

देखता हूं

तुम पतंग सी दीखती हो

चटकीले पीले रंग की

और पीछे

हल्का नीला आकाश

खिलखिला रहा है।

Tushar dhaval mumbai me rahte hain. afsri krte hain. kvita to jahir hai likhte hi hain. mujhse lgta hai bahut dinon se naraj hain, inka fon bahut dino se aaya nhi hai, message ka jvab nhi dete hain...vaise yarbas aadmi hain...inke sath cnaught place me volga me daroo pine ki yaden hain...abhi bs itna hi...bhadasi bhaee khojen mera yh dost kahan hai aur mujhse naraj kahe hai. shayd fon no. yhi hai- 09930315966
(tushar ki ye kvitaen yhan TADBAV se sabhar di ja rhi hain)
http://www.tadbhav.com/issue%2015/Charkabitai%20tusar.htm#chartusar

Tuesday, April 08, 2008

विशाल श्रीवास्तव की कविताएँ

1. प्रकाश

हमें चाहिए धूप
कि हम पढ़ सकें जीर्ण पन्नों को
सुधार सकें नये लिखे के हिज्जे

हमने बोई है आसमानी खेत पर
उजाले की कुँवारी हरी दूब
हमारा रक्त पहले से है वातावरण में
देखा है हमने आकाश के आईने में
अपने पीले चेहरों का अक्स
हम पोंछते हैं नारंगी सूरज पर जमी गर्द
इस तरह हमने आकाश को दिया है
हर ज़रूरी सामान
कि वह बना सके उजाला

हम एक पुराने लोहे जैसे
काले दिन के नागरिक हैं
हमें थोड़ा प्रकाश चाहिए


2. मुन्नू मिसिर का आलाप

बहुत पक्का गला है मुन्नू मिसिर का
अद्भुत गाते हैं मुन्नू मिसिर
फिर भी भव्य सभाओं में नहीं जाते मुन्नू मिसिर
कहीं किसी किताब में नहीं छपा है उनका नाम
उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं


अयोध्या के नयेघाट पर गली जैसा कुछ
गली जैसे कुछ में मोड़ जैसा कुछ
मोड़ जैसे कुछ पर पीपल एक पुराना
वहीं कुछ कुछ घर जैसा
और भीतर झुलनी खटिया पर मुन्नू मिसिर


छोटी कोठरी में फैला मुन्नू मिसिर का अथाह एकान्त
बातें करता रहता उनके तरल अंधेरे से
जब बहुत कम कुछ याद रहता है मुन्नू मिसिर को
जैसे वे भूल जाते हैं कि वे शाकद्वीपीय हैं या सरयूपारीण
या फिर कितने साल हुए उन्हें रिटायर हुए


तब उनसे ज्यादा दु:ख सामनेवाले को होता है
कभी-कभी याद आ जाता है उन्हें कोई विचलित राग
कोठरी के अंधेरे में तब टिमटिमाता है
उनके बुजुर्ग गले का सुर
चारपाई का सरकता ढीला निवाड़
डगमगाता है एक प्राचीन हारमोनियम
सीली कोठरी में सन्न-सन्न हवा दु्रत
सांवली बिटिया बारती है एक अरूणाभ ढिबरी
रौशनी को परनाम कर आलाप लेते हैं मुन्नू मिसिर
साधते हैं एकसाथ सुर और अपनी चिरन्तन खांसी को
शहर के उदास पीलेपन को मुग्ध करता है
उनका खरखराता सधा गला
गाना धीमे से शामिल होता है दुनिया में
दुनिया से अचानक थोड़ा दूर जाते हैं मुन्नू मिसिर
वे अपने दुखों से दूर जाते हैं इस तरह


अपने सुरों की नाव पर चढ़ वे घूम आते हैं नदी पार
कभी उनके साथ होते हवा में शामिल
तैरते रहते तमाम प्रतिबन्धित जगहों के ऊपर
कभी दुबक जाते किसी जीर्ण प्राचीन खिड़की पर
कान लगाकर सुनते उसकी जर्जर कुण्डी का संगीत
फिर वे जाते टेढ़ीबाज़ार अपने सुरों के साथ समोसा खाने
कहकहे लगाते उनके कन्धों पर रखकर हाथ
थककर लौटते अंतत: अपनी उसी संकरी गली में
विलम्बित आलाप में याद करते जीवन का अवरोह
नष्ट छन्द नष्ट गद्य नष्ट संगीत
जीवन एक बहदहवास भौंरे की चीख जितना शोर
जीवन डूबती झलमल झपल रौशनी


अचानक खांस पड़ते हैं मुन्नू मिसिर
हारमोनियम के कोने से छिल जाती है कुहनी
एक ताज़ा दर्द सम्मिलित होता है
मुन्नू मिसिर के आलाप में



3. वो आई


वो आई
उसके आने ने जैसे
रात के आसमान में फेंका कंकड़
खिड़की के आकाश में
पहले चाँद थरथराया
फिर जल काँपा आसमान का
फिर एक एक करके झिलमिलाये तारे
सबने कहा देखो वो आई
उसके आने से जागा मेरे कमरे का ऍंधेरा
उसकी तांबई रंगत से खुश हुआ दरवाजा
खुश हुए मेरे गन्दे कपड़े और जुराबें
खिल उठीं बेतरतीब किताबें
सब खुसफुसाये ... वो आई
वो आई मेरे मनपसन्द पीले कपड़ों में
जिनके हरेक तन्तु की गन्ध मुझे परिचित
मैंने जैसे कपड़ों से कहा - बैठो
कपड़े बैठे ... वो बैठी
जैसा कि उसकी आदत है, उसने कहा
कि मन नहीं लगता मेरे बिना उसका
जीना असम्भव है
उसने कहा ... मैंने सुना
फिर
मैंने कहा - बीत गया है अब सब कुछ
मैंने कहा ... उसने सुना
उसने कहा - बीतना भूलना नहीं होता
दर्द को सम्मिलित करना होता है जीवन में
मैंने कहा दर्द .. हाँ दर्द कहाँ बीतता है
सिर्फ हम बीतते हैं थोड़ा-थोड़ा समय के साथ
वह थोड़ा और उदास हुई
गीली हो गईं उसकी ऑंखें
आखिर वह उठी
मैंने उठते हुए देखा पीले कपड़ों को
मैंने देखा पीले कपड़ों को जाते हुए
काँपना बन्द हुआ आसमान का
सो गया फिर से कमरे का ऍंधेरा
दुखी हुए कपड़े और जुराबें
दुखी हुआ दरवाजा
इस बार
सब जैसे चीखकर बोले
वो गई .... वो गई .... वो गई
मैंने सिगरेट सुलगाई
और आहिस्ते से कहा
जाने दो


4. मित्र

मित्र थे
जो चुनते थे
शर्ट की आस्तीन से अदृश्य भुनगे
कन्धे से साफ़ करते थे धूल
ख्याल से भरकर छूते थे माथा
ध्यान रखते थे मित्र

झूठ बोलकर बचाते थे मित्र
क्रूर शिक्षक और क्रुध्द पिता से

मित्र थे
जिन्होंने सिखाया प्रेम करना
जो हमें चौराहों पर मिलते थे
जिनसे गलबहियाँ कर घूरते थे हम
शहर की सुन्दर लड़कियों का दुपट्टा
और अकसर पीछा करते थे
गुलाबी हुड वाले रिक्शों का

मित्र थे
जो हमें दूर ले गये वर्जनाओं से
जिनके साथ सीखा सिगरेट पीने का हुनर
जिनके साथ हाइवे ढाबों पर छुपकर शराब पी
देखीं उनके साथ तमाम मसाला फिल्में
बहुत मौज की जिनके साथ हमने

मित्र थे
जिन्होंने सिखाया क्रोध करना
जिनके लिए हम दूसरों से लड़े और वे हमारे लिए
मित्रों ने छीनी भी प्रेमिकाएँ
तब जी भर कर गरियाया हमने उन्हें
बदले में हुआ बेशुमार गालियों का विनिमय
अद्भुत विरेचक थे हमारे मित्र

हमारी ज़रूरत थे मित्र
बहन की शादी कैसे होती उनके बिना
कैसे होता दादी का अन्तिम संस्कार
माँ की बीमारी में साथ दिया उन्होंने
पहली नौकरी पर स्टेशन छोड़ने गए मित्र

हमारा जीवन थे मित्र
जब गले से लगते थे
तो जीवन मित्रता से पोसा हुआ लगता था

अब दूर हैं मित्र
मिलते हैं इंटरनेट के चैटरूमों में
या फोन पर बाँटते हैं दुख दर्द
पर ऐसे उनके गले नहीं लगा जा सकता
नहीं जमाया जा सकता है धौल
उनकी पीठ पर

इस तरह मित्रता अब भी
बची हुई है हमारे जीवन में
पर जीवनाधार वो
मादक यारबाशियाँ नहीं हैं

विशाल श्रीवास्तव : फैजाबाद में 1978 में जन्म। हिन्दी में पी-एच.डी. और पत्रकारिता तथा जनसंचार में परास्नातक उपाधि के बाद फिलहाल राजकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक। कविताओं के लिए लिए 2005 में 'अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार'। संग्रह "पीली रोशनी से भरा कागज" शीघ्र प्रकाश्य। आजकल कविता के साथ-साथ ब्लांगिंग भी। mobile-09415468684

Sunday, April 06, 2008

कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये

न रवा कहिये न सज़ा कहिये
कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये



दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़
इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये



वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं
मानता ही न था ये क्या कहिये



आ गई आप को मसिहाई
मरने वालो को मर्हबा कहिये



होश उड़ने लगे रक़ीबों के
"दाग" को और बेवफ़ा कहिये
-दाग़ देहलवी

Saturday, April 05, 2008

शिरीष कुमार मौर्य की कविताएँ

1. स्वप्न

मेरे जीवन में उतनी नींद नहीं
जितने स्वप्न हैं

बेशुमार हैं वे
और अंट नहीं पाते मेरी रातों में
शायद यही कारण है
कि मुझे मारनी पड़ जाती है दिन में भी
एकाध झपकी

मेरे हिस्से के एक छोटे-से संसार में
वे ज्यादातर अतीत से आते हैं सम्मोहित करते
और भटकते हुए
कुछ आत्मीय लोगों
और जानी-पहचानी जगहों के साथ

इस तरह
किसी और काल में घटित होते हुए
देखना उन्हें
निश्चित ही सपने से ज्यादा
कुछ है

बहरहाल ऐसे ही वे आते हैं
या मैं जाता हूँ
उन तक
कभी-कभी तो
नींद के बाद की एक जागती हुई नींद में भी

कितनी बचकानी वास्तविकता है यह
कि मैं स्वप्न देखता हूँ वैसे
जैसे
खतने के समय
चाकू चलाने से ठीक पहले
बच्चों को दिखाया जाता है
हंस का पंख


2.एक पुरातन आखेट-कथा


तुम्हारे नीचे पूरी धरती बिछी थी
जिसे तुमने रौंदा
वह सिर्फ़ स्त्री नहीं थी
एक समूचा संसार था फूलों और तितलियों से भरा ]
रिश्तों और संभावनाओं से सजा

जो घुट गयी तुम्हारे हाथों तले
सिर्फ़ एक चीख़ नहीं थी
आर्तनाद था
समूची सृष्टि का

हर बार जो उघड़ा परत दर परत
सिर्फ शरीर नहीं था
इतिहास था
शरीर मात्र का

जिसे तुमने छोड़ा
जाते हुए वापस अपने अभियान से
ज़मीन पर
घास के खुले हुए गट्ठर -सा
उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
उससे उफनती घृणा का स्वाद था

वही स्वाद है
अब मेरी भी ज़ुबान पर !

3.उसका सपना

सारा दिन काम में खटने के बाद
इस घिरती रात में
प्रेम से बहुत पहले ही कहीं
नींद खड़ी हैं
उसकी आंखों में

कुछ अर्द्धपरिचित सपने हैं
वहाँ
अपने होने की हर सम्भावना को पुख्ता करते हुए
उसके सो जाने के इन्तज़ार में

और उन सपनों की भीड़ में हो न हो
वह ज़रूर मैं ही हूँ -
एक भारी और सांवला बादल
छलाछल जल से भरा
बरस न पाने की मजबूरी में भटकता हुआ
धरती के ऊपर
यूं ही निठल्ला-सा

सपने में इतना कुछ देखा - ईजा-बाबू
भाई-बहन
बरसों की बिछुड़ी सखियाँ
कई सारे नगर-क़स्बे-बस्तियां

दिल्ली
लखनऊ
इलाहाबाद
रामनगर
पिपरिया
नैनीताल

अब सुबह जागते ही पूछेगी
यह बात -
कहाँ थे तुम ?
खड़ी हुई मल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर अकेली घबराई-सी
खोजती तुम्हीं को तो
जाग पड़ी थी मैं अकबकाकर
तीन बजे रात !

शिरीष कुमार मौर्य, उम्र: 34 , लिंग: माले , उद्योग: कला
स्थान: नैनीताल : उत्तराखंड : भारत
हिंदी का कवि-अनुवादक और लगे हाथ अध्यापक भी......
नया पता - शिरीष कुमार मौर्य
हिन्दी - विभाग
डी.एस.बी परिसर महाविद्यालय
नैनीताल - २६३ ००२
फोन - 9412963674

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Wednesday, April 02, 2008

मैं और मेरी तन्हाई

अली सरदार जाफ़री


आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तनहाई
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई



ये फूल से चहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते
राहें हैं तमाशाई रही भी तमाशाई



मैं और मेरी तन्हाई



अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोटी है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई



मैं और मेरी तन्हाई



आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे जख्मों का गुलिस्तां
है आंखों से लहू टपका दामन में बहार आई



मैं और मेरी तन्हाई



हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है हंस कर कभी गाती है
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई



मैं और मेरी तन्हाई

सरदार जाफ़री ने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा. वह आलोचक भी थे. अच्छे फ़िल्मसाज़ भी थे. प्रभावशाली वक़्ता भी थे और उनके साथ 99 शायरी के संकलनों के शायर भी थे. इनमें ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) हैं.

सरदार अब हमारी दुनिया में नहीं है. लेकिन उन्होंने अपनी नज़्म 'मेरा सफ़र' में फ़ारसी के शायर रूमी के एक मिसरे के ज़रीए जीवन की मौत पर विजय की बात कही है.


(सरदार जाफ़री ने नए शब्दों और विचारों के साथ रचनाएँ कीं| जाफ़री की शायरी की भाषा का बड़ा हिस्सा ईरान के उस असर से आज़ाद है, जिससे उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा बोझिल है, उनके यहाँ ऐसी पंक्तियाँ जैसे, 'गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी', 'धुएँ से काले तवे भी चिंगारियों के होठो से हँस रहे हैं' या 'इमलियों के पत्तों पर धूप पर सुखाती है' आदि शायरी में नए लहजे की पहचान कराते हैं)
sabhar: कविता कोश